कार्तिक मास (Kartik Maas)

कार्तिक मास (Kartik Maas)

कार्तिक मास (Kartik Maas) हिंदू संस्कृति में एक अत्यंत पवित्र मास है। इसे दामोदर मास के नाम से भी जाना जाता है। यह पवित्र मास भगवान श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना के लिए समर्पित है एवं वैदिक शास्त्रों के अनुसार तपस्या करने के लिए सर्वश्रेष्ठ समय के रूप में वर्णित किया गया है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, सभी पौधों में से, पवित्र तुलसी मुझे सबसे प्रिय है; सभी महीनों में कार्तिक सबसे प्रिय है, सभी तीर्थों में, मेरी प्रिय द्वारिका सबसे प्रिय है, और सभी दिनों में एकादशी सबसे प्रिय है। (पद्म पुराण, उत्तर खण्ड 112.3)

जैसे सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं है, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, वैसे ही कार्तिक के समान कोई मास नहीं है (स्कंद पुराण)। जो भक्तगण कार्तिक मास के दौरान भक्तिमय सेवा करते हैं, उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत कृपा बहुत सरलता से प्राप्त हो जाती है। कार्तिक मास में भक्त उपवास करते हैं, दामोदर स्वरुप श्रीकृष्ण की पूजा घी के दीपक से करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं, दामोदर लीला का महिमामंडन करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और पवित्र नदियों में स्नान करते हैं जिस से वह स्वंय को सर्वोच्च भगवान श्रीकृष्ण के करीब अनुभव कर सकें।

कार्तिक मास महत्व

पवित्र कार्तिक मास की महिमा का वर्णन करने वाले कुछ शास्त्रों (पुराणों) के अंश निम्नलिखित हैं-

1.) भविष्य पुराण के अनुसार, हे ऋषि, जो भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर के अंदर और बाहर दीप-माला की व्यवस्था करता है, वह उन्हीं द्वीपों द्वारा प्रकाशित पथ पर परमधाम के लिए प्रस्थान करेगा। (१४०) (स्कंद पुराण, ब्रह्मा और नारद के बीच संवाद) एक व्यक्ति जो कार्तिक के दौरान और विशेष रूप से एकादशी के दिनों में एक सुंदर दीप-माला की व्यवस्था करता है, जब भगवान जागते हैं, अपने तेज से चारों दिशाओं को प्रकाशित करते हैं और स्थित होते हैं। एक चमकदार वाहन पर, अपने शरीर की चमक से ब्रह्मांड को रोशन करते है। वे जितने घी के दीयों की व्यवस्था करते थे, उतने हजारों वर्षों तक भगवद्धाम में रहेंगे।

2.) कार्तिक माह (Kartik Month) में दीप जलाना भगवान श्रीकृष्ण की सेवा है। भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर के अंदर और बाहर दीप-माला की व्यवस्था करने से व्यक्ति को भगवान के समान स्वरूप की प्राप्ति होती है।

3.) कार्तिक मास (Kartik Maas) में जब कोई दीपक अर्पित करता है तो उसके लाखों-करोड़ों पाप पलक झपकते ही नष्ट हो जाते हैं।

4.) जो भक्त भगवान केशव को प्रसन्न करने के लिए दीपक अर्पित करते हैं, वह इस मृत्युलोक में पुनः जन्म नहीं लेते।

5.) कार्तिक मास में दीप अर्पित करने से सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने या चंद्र ग्रहण के समय नर्मदा नदी में स्नान करने से प्राप्त फल से दस लाख गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है।

6.) जो भक्त घी का दीपक अर्पित करते हैं, उन्हें अश्वमेध-यज्ञ करने से क्या लाभ? इस प्रकार के दीपदान से अनेक अश्वमेध-यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

7.)यदि कोई भगवान श्री हरि के मंदिर में थोड़े समय के लिए भी (कार्तिक के मास में) (Kartik Month) दीपक जलाता है, तो उसने लाखों कल्पों के लिए जो भी पाप अर्जित किए हैं (एक कल्प 1000 युग के बराबर) सभी नष्ट हो जाते हैं।

8.) किसी के जीवन में भले ही कोई मंत्र न हो, कोई पवित्र कर्म न हो, और कोई पवित्रता न हो, उनके जीवन में भी कार्तिक मास में दीपक अर्पण करने से सब कुछ सही हो जाता है।

9.) जो भक्त कार्तिक के महीने (Kartik Month) में भगवान केशव को दीपक अर्पित करते है, उन्हें सभी यज्ञों और सभी पवित्र नदियों में स्नान करने के समान फल प्राप्त होता है।

10.) पितृ पक्ष के अनुसार, जब परिवार में कोई कार्तिक के महीने में भगवान केशव को दीपदान से प्रसन्न करता है, तो भगवान की कृपा से जो सुदर्शन-चक्र को अपने हाथ में रखते हैं, सभी पितरों को मुक्ति मिल जाएगी।

11.) कार्तिक मास में दीपक अर्पण से मेरु पर्वत या मंदरा पर्वत जितना बड़ा पापों का संग्रह जल जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

12.) जो व्यक्ति कार्तिक मास में दीप अर्पित करता है, उसे वह फल प्राप्त होता है जो सौ यज्ञों या सौ तीर्थों से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।

13.) सभी पापों का आदी और सभी पवित्र कार्यों से विमुख व्यक्ति भी, जो कार्तिक के दौरान किसी तरह दीपक अर्पित करता है, वह शुद्ध हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

14.) तीनों लोकों में कहीं भी ऐसा कोई पाप नहीं है जो कार्तिक के दौरान भगवान केशव को दीप अर्पित करने से शुद्ध न हो।

15.) जो व्यक्ति कार्तिक के दौरान भगवान श्रीकृष्ण को दीपक अर्पित करता है, वह शाश्वत आध्यात्मिक संसार को प्राप्त करता है जहां कोई दुःख नहीं है।

16.) जिस प्रकार अग्नि सभी लकड़ी में विद्यमान होती है और घर्षण द्वारा निकाली जा सकती है, उसी प्रकार कार्तिक मास के दौरान दीपक की भेंट में पवित्रता सदैव स्थित रहती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

17.) जब कोई कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन उन्हें एक दीपक देता है, तो भगवान श्रीकृष्ण, यह पाते हुए कि उनके पास उस उपहार को चुकाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है, वह स्वयं को उस दीपक के बदले में दे देते हैं।

18.) जो कार्तिक मास (Kartik Maas) के दौरान भगवान हरि को एक स्थिर दीपक अर्पित करता है, वह भगवान हरि के आध्यात्मिक संसार में लीलाओं का आनंद लेता है।

19.) यहां तक कि जो कभी भी धार्मिक अनुष्ठान नहीं करता है या यहां तक कि सबसे खराब पापी भी इस दीप-दान से निश्चित रूप से शुद्ध हो जाएगा। तीनों लोकों में कोई पाप नहीं है जो इस कार्तिक दीप के सम्मुख खड़ा हो सके। वास्तव में, इस दीप को भगवान वासुदेव के सामने प्रस्तुत करके, बिना किसी बाधा के शाश्वत निवास प्राप्त किया जा सकता है।

20.) पितृ पक्ष में अन्न दान करने से या ज्येष्ठ या आषाढ़ के गर्म महीनों में पानी बांटने से प्राप्त सभी फल कार्तिक के दौरान दीप को अर्पित करने से आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।

21.) जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास में दिन में केवल एक बार भोजन करता है, वह बहुत प्रसिद्ध, शक्तिशाली और वीर बन जाता है।

22.) हे नारद! मैंने व्यक्तिगत रूप से देखा है कि जो व्यक्ति कार्तिक माह में भगवद्गीता का पाठ करता है, वह जन्म-मरण के लोक में नहीं लौटता।

23.) सभी उपहारों में से कार्तिक माह (Kartik Month) में दीपक का उपहार सबसे अच्छा होता है। कोई उपहार उसके समान नहीं है।

24.) सभी पवित्र स्थानों में स्नान करके और सभी दान देने से जो पुण्य फल मिलता है, वह कार्तिक के व्रत का पालन करने से प्राप्त फल के दस लाखवें भाग के बराबर नहीं है।

 

कार्तिक मास का पालन किस प्रकार करें?

1.) कार्तिक मास में प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर स्नान करना चाहिए. ब्रह्म खण्ड के अनुसार श्री हरि के अति प्रिय कार्तिक मास में जो व्यक्ति प्रात:काल स्नान करता है, उसे समस्त तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होता है। श्रील सनातन गोस्वामी कहते हैं कि भगवान के समक्ष प्रण करना चाहिए, हे भगवान दामोदर, हे भगवान, जो भक्तों को कष्टों से बचाते हैं, हे देवताओं के स्वामी, आपको और देवी राधा को प्रसन्न करने के लिए, मैं कार्तिक के महीने में हर सुबह स्नान करूंगा। (पाठ १७२, अध्याय: सोलहवां विलास, श्री हरि भक्ति विलास)।

2.) यदि संभव हो तो हमें मंदिर के दर्शन करने और भक्तों के साथ भगवान को दीप अर्पित करने का प्रयास करना चाहिए।

3.) प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण को घी का दीपक अर्पित करें और ध्यान करते हुए दामोदराष्टकम का गान करें। जो कोई कार्तिक के महीने में भगवान को घी का दीपक अर्पित करता है, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है, और भगवान हरि के निवास को जाता है।

4.) सर्वोच्च भगवान हरि का सदैव स्मरण करना चाहिए। भक्तों को अधिक से अधिक हरिनाम जप करने का प्रयास करना चाहिए। जितना अधिक से अधिक संभव हो, माला एवं कीर्तन करें।

5.) यदि संभव हो तो प्रतिदिन उच्च वैष्णवों की संगति में श्रीमद्भागवत का पाठ करें। इस मास में साधुओं से शास्त्र सुनने के पक्ष में अन्य सभी कर्तव्यों का त्याग कर देना चाहिए। श्रीमद्भागवतम् के ८वें सर्ग से गजेंद्र मोक्ष लीला-स्तव का पाठ करना और पढ़ना सबसे अधिक फायदेमंद है, जो सर्वोच्च भगवान के पूर्ण समर्पण / निर्भरता की शिक्षा देता है।

6.) प्रतिदिन श्री चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टकम् का पाठ करें और इसके अर्थ पर ध्यान करें। भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा शिक्षाष्टकम् पर भाष्य पढ़ें।

7.) प्रतिदिन श्रील रूप गोस्वामी के उपदेशामृत का पाठ करें।

8.) प्रतिदिन तुलसी देवी को दीप अर्पित करें और वृंदावन में शाश्वत निवास और राधा और कृष्ण के चरण कमलों की शाश्वत सेवा के लिए प्रार्थना करें। तुलसी देवी की 3 परिक्रमा करें।

9.) भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए अच्छा प्रसाद बनायें। भक्तों को अन्नकूट, गिरिराज गोवर्धन पूजा के त्योहार का पालन करना चाहिए।

10.) इस मास में भक्तों का अधिक से अधिक सान्निध्य करें।

11.) ब्रह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए।

12.) संयमता का पालन करना चाहिए।

13.) इस पवित्र मास में वैष्णव आलोचना से बचें।

14.) दूसरों में दोष न खोजे एवं किसी से ईर्ष्या न करें।

15.) इस मास के दौरान हमें चार नियामक सिद्धांतों का पालन करने का पूरा प्रयास करना चाहिए- मांस न खाना, जुआ न खेलना, नशा न करना, एवं अवैध सम्बन्ध स्थापित न करना।

16.) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारी चेतना को निचे गिराने वाले निकृष्ट कार्यों में रात को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। रात के समय जितना हो सके हमें भगवान के नाम का जप करना चाहिए एवं श्रीमद्भागवत का पाठ करना चाहिए।

कातिक मास में क्या खाएं, क्या खाएं

1.) भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया गया प्रसाद ही ग्रहण करना चाहिए।

2.) भगवान श्रीकृष्ण के कई भक्त एक मास के लिए कुछ ऐसा त्याग कर देते हैं जो उन्हें पसंद है। उदाहरण के लिए यदि किसी को दूध पसंद है, तो वह एक महीने के लिए दूध और उसके उत्पादों को छोड़ देता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्ति और तपस्या दिखा रहा है।

3.) कई भक्त दिन में केवल एक बार ही भोजन करते हैं।

4.) पवित्र कार्तिक मास में शहद, तिल, तिल का तेल, हींग, बैंगन, राजमा, उड़द दाल (कोई भी खिचड़ी ), करेला, तले हुए खाद्य पदार्थ जैसे समोसा एवं पकोड़े आदि का सेवन वर्जित है।

5.) इस पवित्र मास के दिनों में मांस और नशीले पदार्थों का सेवन न करें। यदि आपने अभीअभी भक्ति जीवन का अभ्यास करना शुरू किया है और मांस खाना या नशा पूरी तरह त्याग नहीं पाएं हैं तो कम से कम कार्तिक के पवित्र महीने के दौरान इसमें शामिल न होने का प्रयास कर सकते हैं। और यदि आप कार्तिक मास के दौरान इसका पालन करेंगे तो भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमती राधारानी बहुत प्रसन्न होंगे और मांस और नशे को हमेशा के लिए छोड़ने का संकल्प देंगे।

6.) जो लोग चाय और कॉफी का सेवन करते हैं, वे भी कम से कम इस महीने के लिए इसे बंद कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर हर्बल चाय का सेवन कर सकते हैं।

7.) चाय, कॉफी, मांस, मदिरा या कोई अन्य नशीला पदार्थ हमारे शरीर के लिए आवश्यक नहीं हैं परन्तु दुर्भाग्यवश हममें से कई लोगों ने सामाजिक दबाव के कारण या अज्ञानता के कारण इसका सेवन करना शुरू कर दिया और अब इसे छोड़ना मुश्किल है। परन्तु यदि कम से कम कार्तिक के महीने में हम किसी भी ऐसी गतिविधि नहीं करने का संकल्प लेते हैं जो शास्त्रों द्वारा निषिद्ध है तो भगवान श्रीकृष्ण हमारे और उनके बीच आने वाली सभी चीजों को त्यागने के हमारे संकल्प को मजबूत करेंगे।

सोशल मीडिया की लत

आज समाज में बहुत से लोग फेसबुक, व्हाट्सएप और ट्विटर जैसे सोशल प्लेटफार्म के आदी हैं। हम संदेशों की जांच करने, एवं संदेशों को अग्रेषित करने में घंटों बिताते हैं। मैंने देखा है कि मुझे सोशल मीडिया पर सैकड़ों संदेश मिलते हैं और उनमें से अधिकांश मैं शायद ही कभी पढ़ पाता हूँ। और यह कई अन्य लोगों के लिए भी सत्य है। कई बार नामजप करते समय हम अपने व्हाट्सएप, फेसबुक या ट्विटर की जांच करते हैं। यध्यपि संदेश आध्यात्मिक हो सकता है परन्तु हमें स्वयं से यह पूछने की आवश्यकता है कि क्या यह हमें सर्वोच्च भगवान श्रीकृष्ण के करीब आने में मदद कर रहा है?  इस पवित्र मास में हमें सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग करने की आवश्यकता है ताकि यह हमारी भक्ति यात्रा को प्रभावित न करे।

दामोदर लीला (Damodar Leela)

एक बार अपनी दासी को घर के अन्य कार्यों में लगा हुआ देखकर माता यशोदा ने स्वयं ही मक्खन का मंथन किया। जब उन्होंने मक्खन का मंथन किया, तो उन्होंने अपने पुत्र श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था की अद्भुत लीलाएँ गाईं और उनके बारे में सोचकर आनंद लिया। उस समय श्रीकृष्ण वहाँ प्रकट हुए और वह भूखे थे। वह चाहते थे कि माता मक्खन मथना बंद करे और पहले उन्हें खिलाएं।

माता यशोदा ने अपने पुत्र को गोद में उठा लिया और उन्हें दूध पिलाने लगी। जब श्रीकृष्ण दूध पी रहे थे तो माता यशोदा मुस्कुराई और अपने बालक की सुंदरता का आनंद लिया। अचानक चूल्हे पर रखा दूध उबलने लगा। दूध को छलकने से रोकने के लिए, माता यशोदा ने तुरंत श्रीकृष्ण को एक तरफ रख दिया और चूल्हे पर चली गई। अपनी माता द्वारा उस अवस्था में छोड़े जाने पर, श्रीकृष्ण बहुत क्रोधित हो गए, और उनके होंठ और आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उन्होंने अपने दाँत और होठों को दबाया, और पत्थर का एक टुकड़ा उठाकर तुरंत मक्खन के बर्तन को तोड़ दिया। उन्होंने उसमें से मक्खन निकाला, और आँखों में झूठे आँसू के साथ एक सुनसान जगह में बैठ कर मक्खन खाने लगे।

इसी बीच माता यशोदा दूध के बर्तन को क्रम से लगाकर मंथन स्थल पर लौट आईं। उन्होंने टूटा हुआ बर्तन देखा, जिसमें मथा हुआ दही रखा हुआ था। चूंकि उन्हें अपना पुत्र नहीं मिला, इसलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि टूटा हुआ बर्तन बालक का ही काम था।

वह सोच कर मुस्कुराई, बालक बहुत चतुर है। घड़ा तोड़ने के बाद दंड के भय से वह यहां से चला गया है। जब उन्होंने इधर-उधर खोज की, तो अपने पुत्र को लकड़ी के एक बड़े ऊखल पर बैठा पाया, जिसे उल्टा रखा गया था। वह एक झूले पर छत से लटके हुए बर्तन से मक्खन ले रहा था और उसे बंदरों को खिला रहा था।

माता यशोदा ने देखा कि श्रीकृष्ण उनके नटखट व्यवहार के प्रति सचेत थे, क्योंकि वह उनके डर से इधर उधर देख रहे थे। अपने पुत्र को इतना व्यस्त देखकर, वह चुपचाप पीछे से उनके पास पहुंची। यध्यपि, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने हाथ में एक छड़ी के साथ अपनी ओर आते देखा, और वह तुरंत ऊखल से नीचे उतर गए और भय के मारे भागने लगे। माता यशोदा ने भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को पकड़ने की कोशिश करते हुए, सभी कोनों में उनका पीछा किया, जो महान योगियों के ध्यान से भी कभी संपर्क नहीं करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण, जो योगियों अथवा तपस्वियों द्वारा कभी नहीं पकड़े जाते हैं, माता यशोदा जैसे महान भक्त के लिए एक छोटे बच्चे की तरह खेल रहे थे।

यध्यपि माता यशोदा अपनी पतली कमर और भारी शरीर के कारण तेज दौड़ने वाले बालक सरलता से पकड़ नहीं पा रही थी, फिर भी उन्होंने जितना शीघ्र हो सके उनका पीछा करने का प्रयास किया। उनके बाल ढीले हो गए और बालों में लगे फूल जमीन पर गिर पड़े। वह थकी हुई थी, फिर भी वह किसी तरह अपने शरारती बालक के पास पहुँची और उन्हें पकड़ लिया। जब श्रीकृष्ण पकड़े गए तो लगभग रोने की कगार पर थे। उन्होंने अपने हाथों को अपनी आँखों पर रख दिया, जिन पर काली आँखों के सौंदर्य प्रसाधनों से अभिषेक किया गया था। उन्होंने अपनी माता का चेहरा देखा, जब वह उनके ऊपर खड़ी थी, और उनकी आँखें भय से बेचैन हो गईं।

बालक को भयभीत देख कर माता यशोदा ने अपनी छड़ी फेंक दी। उन्हें दंडित करने के लिए, उन्होंने सोचा कि वह उनके हाथों को कुछ रस्सियों से बाँध दे। परन्तु जब उन्होंने श्रीकृष्ण को बांधने का प्रयास किया, तो पाया कि वह जिस रस्सी का उपयोग कर रही थी वह दो इंच छोटी थी। उन्होंने घर से और रस्सियाँ इकट्ठी करके उसमें जोड़ दीं, लेकिन फिर भी उन्हें वही कमी नज़र आई। इस प्रकार उन्होंने घर में उपलब्ध सभी रस्सियों को जोड़ा, परन्तु जब अंतिम गाँठ जोड़ी गई, तो उन्होंने देखा कि रस्सी अभी भी दो इंच छोटी थी। माता यशोदा आश्चर्यचकित रह गयीं। यह सब किस प्रकार सभव था?

श्रीकृष्ण को बांधने के प्रयास में वह थक गई। उन्हें पसीना आ रहा था, और उनके सिर की माला नीचे गिर गई। तब भगवान ने अपनी माता के कठिन परिश्रम की प्रशंसा की, और उन पर दया करते हुए, वे रस्सियों से बंधने के लिए सहमत हुए। माता यशोदा के घर में मानव बालक के रूप में खेल रहे भगवान अपनी चुनी हुई लीलाएं कर रहे थे।

शुद्ध भक्त स्वयं को भगवान के चरण कमलों में समर्पित कर देता है, जो भक्त की रक्षा या पराजय कर सकते हैं। इसी तरह, भगवान भी भक्त की सुरक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करके दिव्य आनंद का अनुभव करते हैं। यह श्रीकृष्ण द्वारा अपनी माता यशोदा के प्रति समर्पण का उदाहरण था।

पुत्र को बांधकर माता यशोदा घर के कामों में लग गई। उस समय, लकड़ी के ऊखल से बंधे हुए, भगवान अपने सामने बहुत ऊंचे पेड़ों की एक जोड़ी देख सकते थे (जिन्हें अर्जुन के पेड़ के रूप में जाना जाता था) जिसे उन्होंने नीचे खींचने के बारे में सोचा। अपने पिछले जन्मों में, पेड़ों ने कुबेर के मानव पुत्रों के रूप में जन्म लिया, और उनके नाम नलकुवर और मणिग्रीव थे। सौभाग्य से, वे प्रभु के दर्शन के भीतर आ गए। अपने पूर्वजन्म में उन्हें महान ऋषि नारद ने भगवान श्रीकृष्ण को देखने का सर्वोच्च आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शाप दिया था। उन्हें यह वरदान-शाप नशे के कारण भूल जाने के कारण दिया गया था।

(श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें अध्याय के दसवें स्कंध में एक कथा है, कुबेर के दोनों पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव भगवान रुद्र के सेवक थे। धनी होने एवं भगवान शिव की कृपा कारण दोनों बहुत गर्वोन्मत्त हो गए। एक दिन वे दोनों मन्दाकिनी नदी के तट पर मदिरा पीकर मद में चूर हो गये। अप्सराएँ उनके साथ गा-बजा रहीं थीं और वे पुष्पों से लदे हुए वन में उनके साथ विहार कर रहे थे। दैवयोगवश देवर्षि नारद जी उस स्थान से  निकले। देवर्षि नारद को देखकर वस्त्रहीन अप्सराएं लज्जित हो गयी एवं भयभीत होकर तीव्रता से अपने वस्त्र पहन लिये, परन्तु इन दोनों कुबेर पुत्रों कोई लज्जा नहीं दिखाई, वे उसी प्रकार नग्न अवस्था में क्रीड़ा करते रहे। जब देवर्षि नारद ने देखा कि ये देवताओं के पुत्र होकर भी गर्व एवं मद से अन्धे और उन्मत्त हो रहे हैं, तब उन्होंने उन दोनों को श्राप देते हुए कहा कि अहंकार के कारण तुम दोनों का व्यवहार जड़ के समान हो गया है इसलिए तुम लोग वृक्ष बन जाओ। सौ वर्षों के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण का अवतार होगा तो वह तुम्हें शाप मुक्त करेंगे।नारद मुनि के शाप से नलकुबर और मणिग्रीव अर्जुन वृक्ष बन गए। इन दोनों वृक्षों के साथ-साथ होने के कारण इन्हें यमलार्जुन कहा गया।)

जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने खींचा, दो पेड़, उनकी सभी शाखाओं और अंगों के साथ, एक महान ध्वनि के साथ तुरंत नीचे गिर गए। गिर कर टूटे हुए पेड़ों में से दो महान आत्माएं निकलीं, जो धधकती अग्नि की तरह चमक रही थीं। उनकी उपस्थिति से सभी दिशाएं रोशन हो गयी। दो शुद्ध व्यक्तित्व तुरंत बाल कृष्ण के सामने आए और अपना सम्मान और प्रार्थना करने के लिए झुक गए। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुबेर पुत्रों, – नलकुवर और मणिग्रीव का उद्धार किया गया।

उस दिन से, कार्तिक (दामोदर) मास को दामोदर-लीला की याद में मास भर चलने वाले उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मक्खन चुराने की लीला है और फलस्वरूप उनकी प्रिय माता यशोदा द्वारा ऊखल से बांधा जाता है। संस्कृत में दाम का अर्थ रस्सी और उदार का अर्थ पेट होता है। दामोदर श्रीकृष्ण को संदर्भित करता है जो उनकी माता यशोदा द्वारा स्नेह की रस्सी से बंधे थे।

kartik maas

श्री दामोदराष्टकम

यह प्रार्थना गीत भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यावस्था की लीलाओं का वर्णन करता है जब उन्होंने अपनी माता यशोदा से भागने की कोशिश की जब उन्होंने मक्खन चुराने के लिए उन्हें दंडित करने की कोशिश की। भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन की महिलाओं एवं गोपियों से मक्खन चुराते थे। एक बार उनकी माता यशोदा ने उसे पकड़ लिया, उसकी कमर को रस्सी से बाँध दिया, और उन्हें दंडित करने के लिए ओखली से बाँध दिया। इसलिए भगवान को दामोदर के रूप में भी जाना जाता है (दाम का अर्थ है रस्सी, और उदारा का अर्थ है कमर)।

कार्तिक मास (Kartik Maas) के दौरान, भक्तगण प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण के दामोदर स्वरुप के सम्मुख घी के दीपक का अर्पण करते हुए इस प्रार्थना को गाते हैं। दीपदान करते समय भगवान के दाहिने पैरों के चारों ओर दो बार और बाएं पैरों के चारों ओर दो बार दीप दिखाएँ। उसके बाद दो बार पेट के आसपास दीप दिखाएँ। फिर सिर के चारों ओर तीन बार दीप दिखाएँ। अंत में भगवान के पूरे शरीर के चारों ओर 7 बार दीप दिखाएँ।  प्रत्येक श्लोक में भगवान के विभिन्न गुणों का वर्णन किया गया है, जो इस समय में, एक बालक के रूप में प्रकट होते हैं और अपने भक्तों के स्नेह से स्वयं को कैद करने की अनुमति देते हैं। नीचे दिए गए आठ-श्लोक की प्रार्थना गाएं, जिसमें हिंदी अनुवाद भी हैं।

नमामीश्वरं सच्चिदानंदरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानं
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १॥

जिनके कपोलों पर दोदुल्यमान मकराकृत कुंडल क्रीड़ा कर रहे है, जो गोकुल नामक अप्राकृत चिन्मय धाम में परम शोभायमान है, जो दधिभाण्ड (दूध और दही से भरी मटकी) फोड़ने के कारण माँ यशोदा के भय से भीत होकर ओखल से कूदकर अत्यंत वेगसे दौड़ रहे है और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेगपूर्वक दौड़कर पकड़ लिया है ऐसे उन सच्चिदानंद स्वरुप, सर्वेश्वर श्री कृष्ण की मै वंदना करता हूँ ।

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तम्
कराम्भोज-युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्
मुहुः श्वास-कम्प-त्रिरेखाङ्क-कण्ठ
स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्ति-बद्धम् ॥ २॥

जननी के हाथ में छड़ी देखकर मार खानेके भय से डरकर जो रोते रोते बारम्बार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मसल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से अत्यंत विव्हल है, रोदन के आवेग से बारम्बार श्वास लेनेके कारण त्रिरेखायुक्त कंठ में पड़ी हुई मोतियों की माला आदि कंठभूषण कम्पित हो रहे है, और जिनका उदर (माँ यशोदा की वात्सल्य-भक्ति के द्वारा) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानंद स्वरुप, सर्वेश्वर श्री कृष्ण की मै वंदना करता हूँ ।

इतीदृक् स्वलीलाभिरानंद कुण्डे
स्व-घोषं निमज्जन्तम् आख्यापयन्तम्
तदीयेशितज्ञेषु भक्तिर्जितत्वम
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३॥

जो इस प्रकार दामबन्धनादि-रूप बाल्य-लीलाओं के द्वारा गोकुलवासियों को आनंद-सरोवर में नित्यकाल सरावोर करते रहते हैं, और जो ऐश्वर्यपुर्ण ज्ञानी भक्तों के निकट “मैं अपने ऐश्वर्यहीन प्रेमी भक्तों द्वारा जीत लिया गया हूँ” – ऐसा भाव प्रकाश करते हैं, उन दामोदर श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वंदना करता हूँ ।

वरं देव! मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह
इदं ते वपुर्नाथ गोपाल बालं
सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः ॥ ४॥

हे देव, आप सब प्रकार के वर देने में पूर्ण समर्थ हैं। तो भी मै आपसे चतुर्थ पुरुषार्थरूप मोक्ष या मोक्ष की चरम सीमारूप श्री वैकुंठ आदि लोक भी नहीं चाहता और न मैं श्रवण और कीर्तन आदि नवधा भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाने वाला कोई दूसरा वरदान ही आपसे माँगता हूँ। हे नाथ! मै तो आपसे इतनी ही कृपा की भीख माँगता हूँ कि आपका यह बालगोपालरूप मेरे हृदय में नित्यकाल विराजमान रहे। मुझे और दूसरे वरदान से कोई प्रयोजन नहीं है।

इदं ते मुखाम्भोजम् अत्यन्त-नीलैः
वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या
मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः ॥ ५॥

हे देव, अत्यंत श्यामलवर्ण और कुछ-कुछ लालिमा लिए हुए चिकने और घुंघराले लाल बालो से घिरा हुआ तथा माँ यशोदा के द्वारा बारम्बार चुम्बित आपका मुखकमल और पके हुए बिम्बफल की भाँति अरुण अधर-पल्लव मेरे हृदय में सर्वदा विराजमान रहे । मुझे लाखों प्रकार के दूसरे लाभों की आवश्यकता नहीं है।

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रभो दुःख-जालाब्धि-मग्नम्
कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानु
गृहाणेष मामज्ञमेध्यक्षिदृश्यः ॥ ६॥

हे देव! हे (भक्तवत्सल) दामोदर! हे (अचिन्त्य शक्तियुक्त) अनंत! हे (सर्वव्यापक) विष्णो! हे (मेरे ईश्वर) प्रभो! हे (परमस्वत्रन्त) ईश! मुझपर प्रसन्न होवे! मै दुःखसमूहरूप समुद्र में डूबा जा रहा हूँ। अतएव आप अपनी कृपादृष्टिरूप अमृतकी वर्षाकर मुझ अत्यंत दीन-हीन शरणागत पर अनुग्रह कीजिये एवं मेरे नेत्रों के सामने साक्षात् रूप से दर्शन दीजिये।

कुबेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ च
तथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥ ७॥

हे दामोदर! जिस प्रकार अपने दामोदर रूप से ओखल में बंधे रहकर भी (नलकुबेर और मणिग्रिव नामक) कुबेर के दोनों पुत्रों का (नारदजी के श्राप से प्राप्त) वृक्षयोनि से उद्धार कर उन्हें परम प्रयोजनरूप अपनी भक्ति भी प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये – यही मेरा एकमात्र आग्रह है। किसी भी अन्य प्रकार के मोक्ष के लिए मेरा तनिक भी आग्रह नहीं है ।

नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने
नमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायै
नमोऽनन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८॥

हे दामोदर! आपके उदर को बाँधनेवाली महान रज्जू (रस्सी) को प्रणाम है। निखिल ब्रह्मतेज के आश्रय और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आधारस्वरूप आपके उदर को नमस्कार है। आपकी प्रियतमा श्रीराधारानी के चरणों में मेरा बारम्बार प्रणाम है और हे अनंत लीलाविलास करने वाले भगवन! मैं आपको भी सैकड़ो प्रणाम अर्पित करता हूँ।

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Anecdote of Boat Festival in ISKCON

Anecdote of Boat Festival in ISKCON

Lord Krishna’s pastimes are divine and pleasing, and we cannot understand these great pastimes with tiny material intelligence. Therefore, to understand these great pastimes and follow them in our lives, we need bonafide disciplic succession.

Lord Krishna says in Bhagavad -Gita

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत

janma karma cha me divyam evaṁ yo vetti tattvataḥ
tyaktvā dehaṁ punar janma naiti mām eti so ’rjuna (BG 4.9)

Hey Arjun, Those who understand the divine nature of my birth and activities upon leaving the body do not have to retake rebirth. Instead, they come to my eternal abode directly.

Chronicle of Boat Festival

In ISKCON (International Society For Krishna Consciousness), many festivals are organized. Thus, we can remember the Lord’s great sacred pastimes and purify our tainted hearts.

Among all these saintly Leela’s of Lord Krishna Nauka Vihar is one of them. This Leela is mentioned in a transcendental scripture named “Gopal Champu”, written by Srila Jiva Goswami. It is also mentioned in other scripture.

About Goloka

Goloka Vrindavan is Lord Krishna’s eternal abode, and there the pastimes go on continuously. So the root of this religious festival is also linked with the land of Krishna- ” Goloka Vrindavan”.

Anecdote of Boat Festival

Once all the gopis, their pots filled with yoghurt and butter, came to the shore of river Mansi. They had a desire to cross this Mansi Ganga. They met with a boatman and asked him to take them on the other side of Mansi Ganga. That boatman agreed. As soon as the boat reached afar, the boatman stopped.

The gopis asked the boatman what happened to you, why you suddenly stopped? The boatman replied I am hungry. I want to eat yoghurt and butter. The gopis gave him all the curd and butter they had with them so that boatman did not stop sailing. After eating, he sailed for a while. After covering some distance, he again stopped. He said I was exhausted, wanted to take a rest. Gopis told if he does not start sailing, they will throw him from the boat.

How Radha Rani spotted Sri Krishna

Suddenly the whole sky got filled with clouds. Winds started blowing, and the boat started shaking and moving. Gopis got scared. At the same time, Radha rani’s eyes fell on the boatman. She noticed a flute with him. She identified, it is no one else other than their beloved Krishna. All the gopis were extremely happy, knowing that this was their Krishna’s wish. It is an example of extreme reciprocating love between Lord Krishna and his devotees.

Bond Between Gopis With Krishna

Gopis are immense devotees of Lord Krishna. Their love for Krishna is of utmost and can not be mentioned in words. Those who reached an enormous level in spirituality can understand the love and bonding between Krishna and gopis and appreciate them. 

About Boat Festival Commemoration

The Boat festival is astonishing which will be celebrated this year at Sri Sri Radha Parthsarthi temple. This year it is also significant because due to covid we had not observed this festival last year. So this is the eleventh boat festival we are commemorating. Kaliya Krishna pond area inside the temple campus is decorated with attractive flowers, fruits, balloons and different colours. And the decoration of this place fills the heart with exhilaration. In this, many decorations and paintings are done inside water using beautiful flowers and colours.

How Boat Festival Will Be Celebrated At ISKCON

Sri Sri Radha Parthsarthi’s festive deity (Utsav Vigraha) is taken in a boat with Sri Lalita Ji and

Sri Visakha Ji. That scene is ineffable. Lord is taken to a boat ride along with kirtan, and many preparations are offered to Lord as Bhoga. Thousands of devotees assemble and do kirtan boomingly. Lord is seated in a decorated beautiful boat and takes a ride that scene is pure bliss for devotees.

We are inviting you all to come and take part in this auspicious occasion. When we participate in such a festival, our hearts thrive with darshan, kirtan, remembrance, and the company of advanced devotees makes us feel ecstatic.

So come, let’s celebrate this festival together and acquire the Lord’s blessings by chanting –

Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa

Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare

Hare Rāma Hare Rāma

Rāma Rāma Hare Hare

  • Sri Sri Radha Parthasarathi Boat Festival ki Jai
  • Srila Prabhupada ki Jai

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This Dussehra Kill Your Ravana

This Dussehra Kill Your Ravana

Ashwin Shukla Dashami is known as Dusshera. It is one of the biggest festivals, also known as Dasahara, Dussehra, or Dashain. It is observed on the day of Vijaya Dashami, the tenth day of Navaratri. It is the occasion to glorify and rejoice in the victory of good over evil. On Dussehra, we burn effigies of Ravana outside in surroundings but nurture Ravana inside our hearts. That was Treta Yuga, where only one Ravana existed. Lord Rama assassinated him and acquired victory.

Types of People in Kalyuga

In Kalyuga, every human being has the mentality of Ravana inside. But, as we all know, two types of people exist in this universe- Sur and Asura. Those who worship the Lord are counted as Sur, and those who are not devotees or do not follow the Lord’s orders are considered Asura.

In different Yugas, Sura and Asura stayed in unalike places. In one Yuga, Sura lives on one planet, and Asura lives on another planet. Later on, Asura lived in one country and Sura in the other. But now the time has changed, Sura and Asura are present in every person concomitantly in this era. We all have Sura and Asura simultaneously in ourselves.

The nature and personality of a person totally depend on how strong and determined he is. The day we can kill the malicious, vicious behaviour, we can kill the Asura or Ravan from our selves and that day will be the real Dussehra for us. Do you know? It becomes very painless to do if you are a devotee and listen to Lord’s pastimes.

How You Can Kill Ravana Residing Inside You

One oil lamp is enough to end darkness, similarly to cease Ravana inside, one thought is enough, and we get that thought from our Shastra. In Bhagavad Gita, Lord Krishna tells us three ways to hell-lust, anger and greed. These three are clearly visible in Ravana, and by learning the lesson from his life, you can save yourself from its fury. In the 2nd chapter of Bhagavad Gita, Sri Krishna says about how declination of a person takes place, how a person starts to flunk.

A person’s declination starts by thinking about sexual desire. In creating, it is similar to a small seed. Still, if this seed slowly gets irrigated by contemplation, it becomes Asura. Ravana was also such type of giant Asura. Even many great deities palpitate by his name. He had done many austerity and Tapasya to acquire strength, but Ravana aimed to satisfy all sexual desires for an unlimited period. So his senses became the reason for his end.

Ravana had all the desirable things of this world. But on hearing about the beauty of Mata Sita from his sister Surpanakha, his mind filled up with sexual desire, and that is the beginning of his declination. He always considered himself as strongest, but he never had control over his senses.

Your Senses Could be the Reason for Your End

So it’s true that even if a person achieves victory in this whole world but if his mind is not in control of his will, he will indeed get defeated. Mata Sita is Lord Rama’s wife. If Ravana did not had any wrong intention and served her as he was a great scholar and he knew who is Sita mata, he might have become a devotee.

Still, due to lust he had chosen a wrong way and started thinking that he can get anything. Even after knowing who is Lord Ram, he had started thinking lord as his rival. He had decided to get Sita Mata and for that he was ready to stoush with lord Rama.

So in that condition, his lust  for her got transformed into anger and became the reason of his end. This only happens with us; when we get hyper, whatever we desire to get when we do not get that, we loose our temperament. Due to that anger, a person loses his ethics and morality that is the sense of thinking about what to do and what to not.

How Ravana Cheats

Ravana also forgot his ethics and made a plan and went to Marich. Marich acquired the form of golden deer. Ravana himself attained the form of a saint. He was the son of a brahmin and also was a great scholar. But lust, anger and greed deformed his personality.

Similarly, when someone’s heart gets filled with lust, his heart becomes filled with fraud. Then he starts to cheat everyone as Ravana cheats Mata Sita attaining the form of the saint. Ravana forcefully takes Sita Mata to Lanka with him. Sri Ram sends all soldiers of Hanuman Ji and Sugriva in all directions to search Sita Mata. Hanuman Ji crossed the sea and searched Mata Sita.

After reaching there, he gave Lord Rama’s message to Sita Mata. He destroyed Ashok Vatika. Later on, he burnt various places in Lanka. He gave a warning to Ravana that I am the slave of Sri Rama. So it will be better for you if you return Mata Sita. Otherwise, wait and see what Lord Rama will do with you.

Lust Leads to Declination

But Ravana was so indulged in it that he did not take that warning seriously. When Vibhisan tried to make it, he understood Ravana ordered him to get deported. His wife Mandodri kept on trying to make him understand that stay satisfied with me we have a happy family I will fulfil all your desire. Please let Sita go. Can’t you see the hanging rope on you? But Ravana was not ready to understand anyone’s advice, such as his wife, Hanuman Ji, Marich, and his own loving brother.

Such lust, anger and greed in our hearts are similar to Ravana, who steals bhaktirupi Mata Sita from our hearts. And we start to consider Lord as our enemy. And in such conditions, we don’t accept the words of saint and Shastra. There was no other way other than war. Ravan was seated on a wheeled carriage, and Ram was standing on land. In that condition, Indra dev sent the carriage for Lord along with the charioteer. It was a great war, and to witness that all the demigods even convene. It was the biggest war in history.

Lord said in Bhagavad Gita, chapter 4, verses 34

tad viddhi pranipatena pariprashnena sevaya
updeshyanti tegyan gyanistatva darshinen

If we desire to learn the truth, we have to take shelter under Guru and serve him courteously.

Lord Rama himself teaches us by showing his life as an example that if we want to defeat Ravana inside us, we have to serve a true devotee of the Lord as a guru. So, on being happy with Lord Rama, Muni awarded him Aditya Hriday Mantra.

Lord’s one name is Aditya, which means sun. As the sun vanishes all the darkness, a true devotee can acquire control over all such thoughts.

How Devotees Serve to Lord

During this war, Vibhisan reached there; he said to Rama that there is Amrita or nectar in Ravana’s heart. And on drying it, only Ravana can be killed from the heart. Here Vibhishan depicts the role of a true companion devotee.

It teaches us that while fighting with the Ravana inside us, we need devotee companions to remember what learning we obtained from Guru, Sadhu and Sastra.

Further, lord Rama used the arrow on Ravana given by Agasthya muni after reciting the mantras. As a result, Ravana falls from his chariot. The scene depicts as on beating Indra’s thunderbolt any mountain got diminished.

Ravana’s army was wailing, and Vanara Sena was Honouring Sri Rama.

In this way, Lord is teaching us how to win from internal Ravana along with external Ravana present in ourselves. We have to chant mantras because they will provide strength to us.

Hare Krishna Hare Krishna
Krishna Krishna Hare Hare
Hare Rama Hare Rama
Rama Rama Hare Hare

This mantra smash lust, anger and greed as in Aditya Hridaya Mantra  Lord Vishnu’s strength is present. Similarly, in Hare Krishna, the maha-mantra concludes all the power of the Lord.

Three Things Needed To Kill Ravana Inside Us

  1. Divine the grace of devotees such as Agasthya muni.
  2. Vaishnav’s company, for example, Vibhisan
  3. Chanting of the Holy Name of the Lord

By following these three points in our life, we can defeat the Ravana inside us. And bring transformation from darkness towards light and celebrate Dusshera every day.

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Maa Durga is the presiding deity of this material world

Maa Durga is the presiding deity of this material world

Maa Durga is a revered goddess for those who follow Sanatan Dharma. Hindus worship her all over the world in the form of Mother Shakti.

Generally, we have seen Maa Durga with ten hands with some weapons and ride over Lion, who displays his infinite powers. It is also concluded that she fights against demonic power who are trying to cause damages to peace, prosperity, and religion. Durga Puja, also known as Durgotsava or Shardotsava, is an annual Hindu festival celebrated in South Asia in which Goddess Durga is worshipped. 

Who is Maa Durga? 

According to Shastra, Maa Durga is an expansion of Mother Parvati, the wife of Lord Shiva. She takes the form of Navdurga and does all the upbringing of this world. Lord Sri Krishna also tells Arjuna in the Bhagavad-Gita, Chapter 9, text 10

mayadhyaksena prakrtih
suyate sa-caracara
hetunanena kaunteya
jagad viparivartate

This material nature is working under My direction, O son of Kunti, and it is producing all moving and unmoving beings. Therefore, by its rule, this manifestation is created and annihilated again and again.

Durga Devi is the presiding deity of this material world. It is also believed that the person who is getting diverted from the spiritual world of Lord Krishna and going against the rules, they sent to this material world of Goddess Durga. The comparison of this material world is made with Durg, a type of Fort. This Fort is the correctional home of all the rebellious souls, where they spend their lives protecting Durga Devi, facing the Tritaap (Adhyatmika, Adhibhautika and Adhidaivika).

The trident in the hand of Goddess Durga is a symbol of reminding all the rebels who have come into this material world of Lord through Tritaap (Adhyatmika, Adhibhautika and Adhidaivika). Maa Durga is worshipped to get rid of these tritapas.

When a person comes to this material world, they have to face many sufferings like birth, death, old age, diseases, adhyatmika, adhibhautika and adhidaivika miseries. Goddess Durga takes care of all these things.

Therefore, worshipping Goddess Durga will help them get rid of these sufferings. However, if you want a permanent solution, you have to come out of this material world. 

To get rid of the cycle of birth and death, people worship Goddess Durga. As a result, such living beings get an opportunity to do devotion to the Lord. As a result, they get rid of Mahamaya, the potency of the Lord, and come under the protection of his own Shakti, Yogamaya. 

Srimad Bhagavatam also mentioned that the Gopis worshipped Mother Katyayani to get Lord Krishna as their husband. It is also mentioned in Brahma Samhita, Chapter 5, Text 44-

srishti-sthiti-pralaya- sadhana-shaktir eka
chayeva yasya bhuvanani vibharti durga
icchanurupam api yasya che cheshtate sa
govindam adi-purusham tam aham bhajami

The external potency Maya who is of the nature of the shadow of the cit potency, is worshipped by all people as Durga, the creating, preserving and destroying agency of this mundane world. I adore the primaeval Lord Govinda in accordance with whose will Durga conducts herself.

The Lord presides over this material world objectively, and those who do not accept it are sent to this world of duality. Therefore, by coming in contact with a pure devotee, if the living entity understands that this material world is not his real home, he becomes free from here and goes to his original home in Vaikuntha or Goloka Vrindavana and attains bliss forever.

So on this Durga Puja, let us pray to Maa Durga to give us enough strength to get us out of this material world and go back home, back to Godhead. 

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Significance of Bhadra Purnima

Significance of Bhadra Purnima

Purnima is considered the most auspicious day in the Hindu calendar. It is regarded as the most sacred and fruitful day. Generally, every Purnima has some importance, but the Purnima falls on Bhadrapada month is most significant. Its great reason is from this Purnima Shraddha Paksha, also known as Pitra Paksha starts. It lasts till the new moon of Ashwin. On this day, in few parts of India, Ganesh Utsav comes to an end, and on the other end, shraddha paksha begins.

Importance of Bhadrapada Purnima:

On this Purnima, it is a provision to worship Lord Satyanarayan. It is believed that any devotee who worships Lord Satyanarayan on this Purnima will get rid of all struggles. Their house will be brim with wealth. A person will achieve position and fame in their life. Among all the handouts, the most superior is the sharing of knowledge. It will never take a person to nescience and befit for leading a successful life.

About Bhadrapada Purnima In Srimad Bhagavatam

In Srimad Bhagavatam, 12th canto 13th chapters 13th sloka, if a person gift Srimad Bhagavatam on the day of Bhadra Pada Purnima will achieve success in the spiritual pathway and attain enlightenment. Thus, in this line of Bhagavatam, knowledge of spirituality and its significance is attained.

Glories  of Srimad Bhagavatam

Srimad Bhagavatam is the crown head of all the shastra. It is described as ripen fruits of kalpavriksha of shastra. When Srila Vyasdev was not satisfied after writing all the Vedanta and Puranas, he inscribed Srimad Bhagavatam. It is the concluded form of all Shastras, and It is an Amal Puran means free from all contamination.

At the beginning of the Bhagavatam, Srila Vyasdev announced that whoever will read this book with devotion and dedication, Lord will be situated in the heart. Therefore, that person will get transcendental devotional service of the Lord. Apart from this, no other scriptures are needed.

In Padam Purana, it is mentioned that Srimad Bhagavatam is not different from Supreme Lord. Various cantos of Bhagavatam are compared with Lord’s various body parts. Srimad Bhagavatam is the ultimate source to reach  Krishna. It is originated just after the departure of the Lord from the material world to the supreme abode.

How Srimad Bhagavatam Enlighten Our Life:

Currently, there are innumerous evidential Shastras, but Srimad Bhagavatam has great significance. It shows light or pathway to people who lost their way and indulged in the darkness of unawareness. Srimad Bhagavatam is collated with the sun. It shows that without its assistance, other Shastras are ineligible to establish this ultimate truth.

The upshot of Reading Bhagavatam:

On reading Srimad Bhagavatam, anyone can get the gist of all the Vedas. Anyone can attain the ultimate goal of life by reading this to awaken divine love for Supreme Lord and all the living beings. Another goal is to go back home back to Godhead. Many people ask that these things are a matter of the future and what they will achieve while surviving in this materialistic world. Few examples will help them to understand what they will get.

First Example:

When Kansa, after the forecast, held Devaki’s hair and was going to kill her. In such a situation, if instead of Vasudeva, anyone else might have been there, either he might have brawl or abscond. But Vasudev Ji contended the situation. In this way, we also go through many such cases in our family life, social life, married life.

Second Example: As Dhruv Maharaj, after attaining his devotional goal, his brother was killed by Yaksha. To take revenge by showing anger, he fought with Yakshas to kill them. But later on, anyhow, he tranquil his rage. But no one knows what happened to him suddenly. How he pardoned everyone and how he let off their mistakes.

Lessons Procured Through Examples:

From this example, we should learn to change ourself and to keep our mind calm. Leaving jealousy how to reveal love, how we should behave with people. Suppose you have anyone like Dhritrashtra, how you should treat him, how to treat with our loving ones, with people of similar age groups, atheists, believers, and Supreme Lord. In that case, if he is a male, then with a female, with kids, with people, we learn all these things from Bhagavatam.

So it’s a humble request that on this auspicious festival of Bhadrapad Purnima take and distribute divine scripture of Srimad Bhagavatam. On reading this, we also get material wealth and peace. It relieves us from all sufferings. Above all this, every day for a fixed duration, we should go to Lord’s Pilgrimage, serve him, get the opportunity to worship. Therefore we all should take the privilege of this sacred festival and read Srimad Bhagavatam. If anyone does not have it, they can visit any nearby Iskcon temple and buy it from there or order it from https://buygita.in/.

From this, Purnima Tithi shraddha Paksha is beginning. So everyone should try to read Bhagavatam, a gift to others, as much as they can and unfurl the knowledge gain through it. Through this, our ancestors will also acquire peace and salvation.

In this way, on this Bhadrapad Purnima, we should spread Bhagavatam and Share its knowledge with society and make our own life worthy.

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    Appearance of Srimati Radha Rani (Sri Radha Ashtami)

    Appearance of Srimati Radha Rani (Sri Radha Ashtami)

    Sri Krishna is the fountainhead of all incarnations. Similarly, Radharani is the source of all goddesses such as Laxmi Ji, Rukmini Ji and Satyabhama. She is the ultimate source who serve with endearment to the Supreme Lord in both the material and spiritual world. When in someone’s heart there is a flow of Krishna’s love, devotion and rasa then it becomes a shrine. When Triveni of love, devotion and rasa flows in someone’s heart, that gesture is known as Radha Bhava. This surpassing devotion and love for Krishna are known as Radha bhava in the heart.

    Story Of Radharani’s Appearance-

    The story is of when Nanda Baba and mother Yashoda lived in Nandgaon, and Vrishbhanu and mother kirtida Lived in Barsana. Both families were very close and intimate friends of each other. Both the couples were not blessed with a child at that time. So, Nandbaba and Maharaj vrishbhanu decided to settle at the bank of the holy river Yamuna. Yamuna Ji is very loving and kind. So, on staying close to her at the bank of river Yamuna, we will unquestionably be blessed with the child. So, in this way, Nandbaba got settled at the sacred land of Gokul and Maharaj Vrishabhanu at Rawal.

    Later, Krishna appeared on Ashtami tithi of Bhadrapada month of Shukla Paksha. We celebrate that momentous day as Janmashtami. On Ashtami tithi of Bhadrapada month Vrishabhanu Maharaj went to take a dip at the pond during dawn which is known as Arunodaya Bela he noticed a dazzling light. That gratifying light was pleasing his eyes. When Sri Vrishabhanu went near that light, he saw those golden light rays coming from a glaring lotus. When he went close by, he noticed that the sparkling light was not coming from that bright golden lotus. It was coming from the utmost beautiful girl present inside it.

    On watching that girl, Vrishabhanu Maharaj’s love strings were overflowing. Brahma Ji appeared at that time, and one prophecy occurred.

    Prophecy You did severe penance in previous births to get the internal potency of Supreme Lord Krishna in the form of a daughter.

    Lord Brahma’s Utterance

    Srimati Radharani is appearing as your daughter. So, you take Her to your house and do Her upbringing. On hearing this, Vrishabhanu Maharaj, being pleased, took her to his house. But after reaching home, he noticed that the girl neither opened her eyes nor spoke or listened to anything. He got upset.

    Narad Muni’s word

    Then Narad Muni comes there disguised and asks him to celebrate the appearance of Shri Ji herself on the attainment of Kanyaratna.

    So, Vrishabhanu Maharaj arranged a grand ceremony to celebrate the appearance of his daughter. In that function, Lord Sri Krishna, Balrama, Mother Yashoda and Nanda Baba appeared. In this way, Nanda Maharaj has got Sri Krishna, and Vrishabhanu Maharaj has got Shri Ji.

    Celebration of Radharani’s Appearance

    People were playing instruments; All the guests were welcomed with scents, butter and mishri. People were singing a song, and boon companions were dancing, wearing new dresses. Everyone appeared to get a glimpse of Vrishabhanu’s daughter. All the guests were served various delectable dishes.

    How Lord Krishna Met Srimati Radharani in the house of Vrishbhanu Maharaj

    Everyone was indulged in their work. That time baby Krishna crawled and came near Radha rani. With the support of the cot, he stood near Radharani and touched her. As soon as he touched Radharani with his sacred hands, Radharani opened her eyes and started crying. On hearing Radharani’s screech, everyone spurted. Vrishabhanu Maharaj and Kirtida were delighted that their daughter could speak, see, and listen.

    Conversation Between Lord Sri Krishna and Srimati Radharani at Goloka

    At Goloka Vrindavan Dham, Lord Sri Krishna said to Srimati Radharani :
    Hey Sakhi, it’s time to appear on the earth. Radharani answered that if Sri Vrindavan Dham, Govardhan and Sri Yamuna Ji were not present, I don’t want to go there. On hearing this, Lord Krishna replied I knew it, so I already sent some part of Vrindavan Dham, Govardhan and Yamuna Ji together to the material world. So, you can stay there forever. Then Radharani replied I have one more issue to discuss. Until the time I get sight of your face, I will neither watch anything nor hear or say anything. So, she was waiting for Shri Krishna.

    Real Purpose of Human Life

    The main aim of our life is to surrender unto the Supreme Lord Sri Krishna’s lotus feet. Therefore, we should have dedication, concentration, determination to serve Lord Krishna and the best example is Radharani. Lord Sri Krishna himself came to this world 500 years ago to show the love and devotion of Radharani to people. To spread it, Sri Krishna appeared as Sri Chaitanya Mahaprabhu and propagate Harinam sankirtan.

    According to Srimad Bhagavatam, in Kaliyuga, the best and easiest way to uplift humankind is Harinam sankirtan.

    So, In this Radha Ashtami, let’s get a unique darshan of Sri Krishna and Srimati Radharani. Along with it, adopt the maha-mantra which is itself given by the lord as an essential part of our life.

    Hare Krishna Hare Krishna
    Krishna Krishna Hare Hare
    Hare Rama Hare Rama
    Rama Rama Hare Hare

    There is nothing more important and influential than this maha-mantra given by Supreme Lord Sri Krishna itself. And to spread it for the benefit of people, He came to this world.

    So, let’s chant the Hare Krishna maha-mantra on this Radha Ashtami to get the blessings of the most loving, tender-hearted Radharani.

     

    • Fasting till noon

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